भारत के करोड़ों परिवारों की रसोई चलाने वाली एलपीजी की आपूर्ति मध्य पूर्व के देशों पर बुरी तरह टिकी हुई है। कुल जरूरत का 60 से 66 प्रतिशत हिस्सा आयात से पूरा होता है। खाड़ी क्षेत्र के तनाव ने ऊर्जा सुरक्षा को खतरे में डाल दिया है। संयुक्त अरब अमीरात, कतर, सऊदी अरब और कुवैत जैसे देशों से आने वाला 92 प्रतिशत आयात होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते देश पहुंचता है। भू-राजनीतिक अस्थिरता, विशेषकर ईरान से जुड़े मुद्दों ने कीमतों में इजाफा कर दिया है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यह निर्भरता रसोई गैस की कमी का सबब बन सकती है।

मांग और उत्पादन का अंतर
देश दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी उपभोक्ता है। सालाना 28 से 30 मिलियन टन की मांग है, लेकिन घरेलू उत्पादन महज 40 प्रतिशत तक सीमित है। रिफाइनरियों से प्राकृतिक गैस के उप-उत्पाद के रूप में यह गैस तैयार होती है। रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी सबसे बड़ी इकाई है। इंडियन ऑयल की पारादीप, हल्दिया, विशाखापत्तनम, बरौनी, मथुरा, बीना और चेन्नई रिफाइनरियां तथा जीएआईएल के विजयपुर व गंधार संयंत्र भी अहम भूमिका निभाते हैं। उज्ज्वला योजना से 10 करोड़ नए कनेक्शन जुड़ने से मांग 20 प्रतिशत बढ़ चुकी है। आयात का बोझ इसी कारण असहनीय हो गया है।
प्रमुख आपूर्तिकर्ता देश
यूएई कुल आयात का 40 प्रतिशत देता है। कतर 22 प्रतिशत के साथ दूसरे नंबर पर है। यहां 20 साल के लंबे समझौते से सालाना 75 लाख टन गैस की गारंटी है। सऊदी अरब और कुवैत प्रत्येक 15 प्रतिशत योगदान देते हैं। अमेरिका, नॉर्वे, ओमान, ऑस्ट्रेलिया व रूस जैसे देशों से विविधीकरण की कोशिशें तेज हुई हैं, लेकिन उनका हिस्सा अभी आठ प्रतिशत ही है। लॉजिस्टिक्स खर्च अधिक होने से ये विकल्प अभी महंगे साबित हो रहे हैं।
उभरते संकट और सरकारी कदम
मध्य पूर्वी तनाव ने होर्मुज से 90 प्रतिशत आयात को असुरक्षित बना दिया। एलपीजी कीमतें 10 से 15 प्रतिशत चढ़ चुकी हैं। कालाबाजारी की शिकायतें आम हो गई हैं। सरकार ने रिफाइनरियों को उत्पादन 25 प्रतिशत बढ़ाने का आदेश जारी किया। अमेरिका व ऑस्ट्रेलिया जैसे वैकल्पिक स्रोतों से खरीद तेज करने की योजना है। पेट्रोलियम मंत्रालय ने आश्वासन दिया कि उज्ज्वला लाभार्थी प्रभावित नहीं होंगे।
भविष्य के उपाय
दीर्घकालिक समाधान के लिए रिफाइनिंग क्षमता बढ़ानी होगी। प्राकृतिक गैस उत्पादन को बढ़ावा देकर घरेलू आपूर्ति मजबूत करनी है। बायो एलपीजी व ग्रीन हाइड्रोजन जैसे विकल्पों पर काम तेज है। राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन इसी दिशा में कदम है। सब्सिडी बोझ, जो सालाना 30 हजार करोड़ तक पहुंच चुका है, को कम करने के लिए विविधीकरण जरूरी है। यदि समय रहते कदम न उठाए गए, तो आम आदमी की रसोई प्रभावित होगी। भारत को आत्मनिर्भर ऊर्जा नीति अपनानी ही होगी।











